Tuesday, 18 January 2011

ओ...हरामजादे

दम घोटता सा लगता है
सिगरेट का धुआं
पर छोड़ा नहीं जाता
जब भी कुछ दरकता है भीतर
हलक में उतारने को
आतुर होता हूं ये धीमा ज़हर /

मेरी बेचैनी बढ़ा देती है
तुम्हारे होंठों की थिरकन
मंजिल पा लेने की
सीढ़ी नज़र आती है तुम्हें
मेरे माथे की हर शिकन /

व्यवस्था के दंश तले
खुद को कितना
अव्यवस्थित बना लिया
बिना किसी गलती के
तुमने दुत्कारा
और हमने सह लिया/

अनिष्ट की आशंका के बोझ तले
मेरुदंड कमान बनता रहा
और मैं बस खुद को
छि: थू कर धिक्कारता रहा/

पर भीतर ही भीतर
भावना और विवेक में ठन गई
और तुम्हारी घुड़कियों की गांठ
से प्रत्यंचा तन गई…/

शब्दभेदी तुणीर में अब तीर है
ओ—हरामजादे....बचना
क्योंकि निशाने पर सिर्फ तू है।

Sunday, 31 May 2009

हासिल


प्यासे ने बस रेत फांकी है
नदी तो अब दूर होती जाती है

पर कल का क्या पता
दूर होते-होते मौजें भी लौट आती हैं

फिर जब आए हो तो तसल्ली कर लो
वक्त बहुत है....
अभी तो बहुत रात बाकी है।