Wednesday, 14 May, 2008

लाल हुआ गुलाबी शहर.....














सूरज ढल चुका था। जयपुर शहर की रंगत धुंधली पड़ रही थी। गुलाबी शहर को आगोश में लेने के लिए, पैर पसार रहा था एक काला साया। लेकिन बिजली की रोशनी से शहर पर धीरे-धीरे सुनहरी रंगत चढ़ती दिखाई पड़ रही थी। ज्यादातर लोग घरों में होने के बजाए सड़कों पर थे। वो चैन की नींद से पहले रोजमर्रा की जरूरतों का साधन जुटाने के लिए बाजार से खरीदारी में जुटे थे।

वक्त को टुकड़ों में बांटती घड़ी की सूइयां शाम के सात बजे के पार जा रही थीं। कुछ लोग तो अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर कई बार नज़रें भी डाल चुके थे। वो बेकरार थे जल्दी घर वापसी के लिए। एक लय में दौड़ती घड़ी की सूइयां सात बजकर इक्त्तीस मिनट पर जा पहुंची।
मगर ये क्या इसके बाद तो मानों बस यंत्र चालित घड़ी की सूइयां रेंग भर रहीं थीं, जबकि गुलाबी शहर के लिए वक्त ठहर सा गया।




एक जोरदार धमाका और कोहराम मच गया। धमाका मानक
चौक पुलिस के कंपाउंड में हुआ था। पुलिस कर्मी दौड़कर वहां पहुंचे पर लोग कुछ समझ पाते इससे पहले उनके कानों में गूंजी एक और धमाके की दूर की आवाज। इस बार निशाने पर था जौहरी बाज़ार। इसके बाद तो मानों सिलसिला ही शुरू हो गया एक के बाद एक पूरे नौ धमाके। महज पंद्रह मिनट के भीतर लहूलुहान हो उठा गुलाबी शहर।

दिन मंगलवार, क्या बाज़ार, क्या भगवान का द्वार हर ओर पुता था लाल लहू का रंग। पंद्रह मिनट के लिए धमाकों के शोर में डूबा शहर अब महज कराह रहा है। मानक चौक, जौहरी बाजार, त्रिपोलिया बाजार, बड़ी चौपाल, छोटी चौपाल, कोतवाली हर ओर बस तबाही।
अस्पतालों में खून की कमी पड़ गई। करीब 200 सांसे दवा और दुआ के सहारे जा टिकीं, वहीं सत्तर ज़िंदगियां घर वापसी की हर उम्मीद खो बैंठीं। उनके परिवार के हिस्से बचा कभी न खत्म होने वाला इंतजार......जबकि हमारे आपके पास चंद सवालात, नाकामी किसकी ? केंद्र या फिर राज्य सरकार....यानी बस बतरस का अंतर्द्वंद।
असलियत में एक बार फिर भोगाने को मिला भय........कहीं उस वक्त वहां होता मैं, या परिवार से जुड़ा कोई दूजा। सचमुच उम्मीद नहीं थी यादों के इस कोने को लहू इतनी जल्दी फिर से गीला कर जाएगा..................
नोट- राजस्थान पत्रिका से ली गई हादसे की तस्वीर।

Friday, 2 May, 2008

गीली यादें...









जोर की बारिश से बाहर पेड़ों की पत्तियों पर जमीं गर्द धुल गई। पत्तियों पर नई चमक दिख रही है। गहरी धानी रंग की पत्तियों से टपकती बारिश की बूंदे, पत्तियों के आखिरी कोर पर पहुंचकर मोतियों की शक्ल अख़्तियार करतीं हैं। पत्ती का दामन छोड़ने से पहले वो मोतियों की आभा से भर उठती हैं। धरती के अंतस में समाने का कहीं से कोई मलाल नहीं उन्हें। ग़ाज भर गई है, धरती पर बुलबुले उठ रहे हैं।

प्रशांत का मन उद्विग्न है। अपने कमरे की खिड़की से वो बाहर निहार रहा है। प्रशांत को लगता है कि उसके भीतर से कुछ रिस रहा है। कई अनसुलझे सवालों की गुत्थियां उसमें बेचैनी भर रही हैं। मौसम से तादात्म बिठाने में उसे ख़ासी मशक्कत करनी पड़ रही है।

अभी ग्यारह जुलाई की ही तो बात है। मुंबई के लोकल ट्रेनों में हुए धमाकों में एक सौ सत्तासी बेकसूर लोगों की जानें सियासत को सबक की भेंट चढ़ गईँ। एक झटके में एक सौ सत्तासी जीती जागती जिंदगियां मांस के लोथड़े में तब्दील हो गईं।

किसने किस पर धौंस जमाई, किसने किसको सबक सिखाया...। ये तय हो भी जाए तो क्या वो ज़िंदगियां वापस लौट सकती हैं ?

हादसे के कुछ ही देर बाद प्रशांत बांद्रा पहुंच गया था। स्टेशन पर अफरा-तफरी मची हुई थी। बारिश जारी थी, राहत का काम चल था। प्रशांत की हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि वो किसी से कुछ पूछे। ज्यादातर चेहरों पर भय था, वहीं प्रशांत कुछ लोगों की नज़रें अपनी ओर तनी पाता। दिल से महसूस करना तो दूर अभी वो पूरा दृश्य देख भी नहीं पाया था कि उसका सेलुलर बज उठा।

प्रशांत की नज़र अनायास ही प्लेट फॉर्म नंबर दो के बुक स्टॉल पर रखे टेलिविज़न पर पड़ती है, न्यूज चैनल का एंकर पूरे तेवर में है....’ जैसा की हम आपको बता चुके हैं, ये न्यूज हमने ब्रेक की है.... और सीधे चलते हैं बांद्रा स्टेशन, ये धमाके के बाद की पहली तस्वीरें हैं, हमारे संवाददाता प्रशांत घटना स्थल पर मौजूद हैं... ’

जी प्रशांत क्या हालात हैं इस वक्त वहां के...
अवाक प्रशांत मशीन की तरह शुरू हो जाता है।
पारितोष यहां पर अफरा-तफरी मची है कोई कुछ भी अभी बताने को तैयार नहीं है, लोगों के चेहरे पर भय साफ देखा जा सकता है। हम अपने कैमरामैन से कहेंगे कि ट्रेन के उस डिब्बे की तस्वीरें दिखाए जिसमें ये धमाका हुआ है...।

पारितोष हमारे साथ एक दर्शक भी मौजूद है जिसकी आंखो के सामने ये हादसा हुआ। आइये जानते हैं इन्होंने क्या देखा। ये कहते हुए प्रशांत ने बिना कुछ सोचे समझे सामने खड़े व्यक्ति के मुंह के पास माइक लगाया ही था कि तभी......

प्रशांत हम आपको थोड़ी देर के लिए रोक रहे हैं, हमारे साथ इस वक्त मौजूद हैं रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव जी, लालू जी एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था को धत्ता बताते हुए लोकल ट्रेन पर निशाना साधा गया...।
देखिए ये बहुत दु:ख की घटना है। कायरता का काम किया है आतंकी लोग। राहत का काम चल रहा है। ऊ लोग अपने मकसद में कामयाब नहीं होगा....।

बदहवाश चेहरे मांस के लोथड़े और लालू का लाइव... अब हमें ये नहीं सोचना पड़ता कि आप ऐसे में क्या देखना पसंद करेंगे। तकनीकी दौर में हम ये सब आपको एक साथ दिखा सकते हैं, दिखा रहे हैं। प्रशांत लालू को सुनते-सुनते कुछ सोच रहा है तभी एंकर की आवाज उसके कानो में पड़ती है।....क्षमा कीजिएगा ये तस्वीरें आपको विचलित कर सकती हैं, मगर हम मजबूर हैं हम आपको लाइव दिखा रहे हैं ये तस्वीरें....।

प्रशांत सोचता है चलो दिन में इस उत्तेजना के साथ दिखाया माफी मांग ली लेकिन रात में तो खाने के साथ परोसना होगा। जायके का खास ध्यान रख कर। गुनाह की ऐसी तस्वीर पेश करने का मौका भला चूकना कौन चाहेगा।

.......आखिर समय ने ये कौन सी रफ्तार पकड़ ली है कि महसूस करने से पहले ही दौर गुज़र जाता है।.... शायद यही वजह है कि बेहद प्लान कर की गई चीजें भी हादसा नज़र आती हैं। प्रशांत की बेचैनी का तकाज़ा भी समय ही है।

......आखिर उस चीथड़ा बच्ची की मुठ्ठियों में कसी गुड़िया की कसक आज मुझे क्यों महसूस हो रही है। उस दिन तो हमारा सारा ध्यान इसी बात पर था जो हुआ सो हुआ अब बस किसी तरह विस्फोट के जिम्मेदारी की खबर ब्रेक हो जाए....। इस आशय की पूर्ति के लिए हमने कई सारे कयास लगा भी डाले। लगता था कि किसी आतंकी संगठन के जिम्मेदारी लेते ही हम आज की अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएंगे ।

......बारिश जारी है, ढेर सारी गाज एक ही जगह इकठ्ठा हो गई है।.....लालू और लाशें...। सियासत और अलकायदा, सिमी या फिर कोई और....प्रशांत उधेड़बुन में है, आखिर ये गाज एक ही जगह क्यों इकठ्ठा हो रही है....। कहीं नाले का मुहाना तो नहीं बंद हो गया...। शायद ऐसा ही है...तभी ये सीवर का पानी भी फैल रहा है....और बदबू भी महज कमरे में नहीं बल्कि सांसों के जरिए भीतर उतर रही....एक पल के लिए प्रशांत को लगा क्या ये सड़ांध सीवर के पानी की ही है या फिर आत्मा..........?

Tuesday, 8 April, 2008

देखो मैं लौट आया....












तुम बेहद ताकतवर हो
पल भर में,
कुछ भी तबाह कर सकते हो,
किसी के सपनों पर
बैठा सकते हो पहरे,

बेटी के हाथ पीले करने का
ख्वाब संजोने वाली आंखों में
तुम डाल सकते हो
पिसी हुई कांच की किरकिरी।

साहूकार का कर्ज चुकता कर
चैन की ज़िंदगी बसर करने की
आस पर
सिर्फ तुम लाद सकते हो
ताउम्र का ब्याज।

तुम वाकई ताकतवर हो
इसलिए कि तुम
‘रार-नीति’ के रोबोट हो,
और
सियासत की चाभी से
दरिंदगी का नंगा नाच
दिखाते हो।

लेकिन...
इस असीम ताकत की वजह है
तुम्हारी बुझदिली,
क्योंकि तुम
अपनी ही अंजाम दी गई करतूतों को
देखने की हिम्मत नहीं रखते।

इंसानियत को हलाक
करने की फिराक में
तुम अगर कुछ मार सकते हो
तो वो है, तुम्हारी आत्मा।

असलियत तो ये है
कि तुम खुद की
परछाईं से भी डरते हो।
देखो.... मैं लौट आया,
पर तुमने क्या पाया ?

नोट: ये तस्वीर है श्रीकिशुन की जो बिहार से सपनों की नगरी (मुंबई) में हजारों अरमानों के साथ आया था।

Friday, 21 March, 2008

आओ रंग भरें...


सामने था
एक खाली कैनवास
बहुत देर रही बेचैनी
कहां रंग भरूं
इस सूनेपन को
क्या आकार दूं?
कुछ देर बाद
नुमाया थी अधूरी जिंदगी
अंधेरे में डूबी सीढियां
और...
हाथों में थमा था
आकार लेता अधूरा सपना.....






नोट: चित्र बनाने से पहले की उधेड़बुन कैमरे में कैद करने के लिए भाई राजेश पुरक़ैफ को धन्यवाद।

Wednesday, 12 March, 2008

उम्मीद...

क्या तुमने कभी कोई पौधा रोपा है
उसे एक उम्मीद के साथ खुद सींचा है,
फिर जड़ पकड़ने पर
जब उसमें आई हो नई कोपल,
याद करो......
उस वक्त कैसा लगा है।

और एक दिन
धीरे-धीरे बढ़ते पौधे की
किसी साख पर
इतराती दिख जाए कोई कली,
उसके फूल बनने का बेसब्र इंतजार,
क्या अभी तक जेहन में रचा-बसा है?

गर वो पौधा खुद में छिपाए रहा हो
एक छतनार वृक्ष का अंश
और अचानक उसकी साखों पर
आ बैठें ढेरों चहचहाते पंक्षी
क्या ये संगीत भी कभी सुना है?

और जब...

उसी पेड़ की किसी साख पर,
मुंह में तिनका दबाए, नीड़ बनाने
आ बैठी थी एक मैना,
या फिर....
धूप तापे, नहाए पसीना
किसी राही का,
उस पेड़ की छांव में रहा हो ठिठकना।

बस, मेरे दोस्त बस,
सुकून का महज ये सुख भोग लो,
फिर हक मांगने के लिए भी
हाथों में थमें कोई खंजर,
तो कहना...।

Thursday, 28 February, 2008

वो आंखें...

कल बाहर बहुत ठंडक थी
आंगन में जमकर ओस बरसी
पर कमरे में गुजारी रात
पसीने से तर-ब-तर थी
नीम अंधेरे में डूबे
नींद के आगोश में
मैने ख्वाबों को
मां की आंखों से देखने की
जुर्रत की थी।

सब कुछ सामने था
पर साफ कुछ भी नहीं दिखाई देता
क्या ख्वाबों पर भी जमती है वक्त की गर्द?
ये सोचना भर था कि मां दिख गई
घर के हर साजो-सामान को
कपड़े से साफ करती
दिन भर वो सफाई में ही जुटी रहती।

मां गोधूली से पहले ही
दिया-बाती में जुट जाती
मुझे सनक सी लगती थीं ये बातें
लेकिन आज पसीने से भिगो गईं
चश्में के भीतर से झांकती
मिचमिचाई सी,
मोतियाबिंद वाली दो आंखे।

क्या इन आंखों से
सपने भी धुंधले दिखते हैं?
सच हो न हो
पर सपने में यही बात खटक गई।

Sunday, 24 February, 2008

कितना कुछ...

गेहूं के नन्हें-नन्हें पत्तों पर
बिछी ओस की चादर
खेतों के बीच,
गोखुर से बनी लीक
और
कुचली सरसो से आती
तिलहन की महक
गीले तलुए में चिपके खर-पतवार
जेहन में अब-तक रची बसी है
उन सुबहों की ठंडक।

खुरदुरी नीम की छाल
धूल उड़ाता अंधड़
धानी पत्तियां,
बहुएं झाड़ती टहनियां
और
दिशाओं में बौर की महक
कोटर से बाहर झांकते
हरियाले तोते की लाल-लाल चोंच
दिख रही है अभी तलक।

Monday, 18 February, 2008

मेरी फोटो गैलरी

Tuesday, 29 January, 2008

ताना-बाना

इक्का-दुक्का बिरवान
वो भी पात मुरझाए
बांहें फैलाए खड़ा बिजूका
सिर पर मटकी औंधाये
हड़ा हड़ा की आवाजें
फिर भी
खेतों पर पंक्षी मंडराए......
धूल का अंधड़ फांके पेड़
पर टहनी बौराए
चिटक रही है खाल तने की
लाल हुई कोपल मुस्काए.....
तपी दोपहरी में
काल-कलौटी खेलें बच्चे
तन की खाल
छिल-छिल जाए
बूंद को तरसी प्यासी धरती
रीझे मेघ आसमान में
नज़र न आएं.....
तीज-त्यौहार उधारी में बीते
आगे है धन का जोग
पोथी बांच पंडित बतलाए
सुख-दुख का ये ताना-बाना,
सुनकर होरी, धनिया, गोबर
पीले दांत चमकाएं..
.............................................
नोट: काल कलौटी
(बारिश होने के लिए तपी ज़मीं पर
लोटपोट कर खेला जाने वाला बच्चों का खेल)

Saturday, 26 January, 2008

ज़िंदगी

ज़िंदगी तालीम और
तज़ुर्बों की कतरन
कभी रूखी
कभी गीली
कभी रंगीन
तो कभी
बदरंग।
ज़िंदगी
हंसती, रुलाती
खीझती, मनाती
कभी गुमसुम
तो कभी
चहचहाती
पायताने बैठती
तो कभी सिरहाने
ज़िंदगी रोज सिखाती है
जीवन के मायने।
कभी उड़ती पतंग
तो कभी
मांझे की तेज धार
ज़िंदगी है
कभी न थमने वाली
रफ़्तार......

Saturday, 19 January, 2008

संचारित रिश्ता

वह जब हंसती थी
तो लगता था जैसे
आंगन में पसारे सुखवन पर
गौरैया का झुंड टूट पड़ा हो
जाड़े की सुबह की सिहरन में
गुनगुनी धूप थी वह।
सुबह का वक्त हो तो
नास्ता किया
दोपहर हो तो
खाना खाया
और रात में तो
वह एयरटेल की धुन पर
इतनी आत्मीयता परोस जाती
कि ममता भरा स्पर्श भी
कुढ़ कर रह जाए
मेरे लिए तो वादियों से गुजरती
छकपक छई करती रेल थी वह।
सेलफोन की घंटी बजते ही
नास्ते की टेबिल से
छत पर जाने की लिए भागता
मां अकसर आवाज देती
बेटा धीमें, चोट लग जाएगी
जवाब देने की फुरसत
पापा को होती थी...
कहते चोट से डरती हो
फिर तो हच का टावर
गांव में ही लगवा लो।
लेकिन ये था ऐसा रिश्ता
जिसे हर रोज चाहिए था
रिंगटोन का भरोसा
और एक दिन आचानक
गुम हुए मोबाइल के साथ
ये रिश्ता भी खो गया।

Tuesday, 8 January, 2008

धुंध

उठ रहा है धुआं
बादलों की छांव में
है अतीत मेरा भी
एक गांव में
सर्दियों के दिन यहां
हंस रहे नि:अंग तन यहां
जल रहे अलाव थे
भस्म सभी भेद भाव थे
तपी हुई जेठ की दोपहर
भली लगे नीम की छहियां
पके हुए गेंहू थे खेत में
झुनझुने बजा रही अरहरिया
लुटे-लुटे से रह गए
पत्ते कुछ पलाश के
जब बिखर गए
सूखी दिखी टहनियां
जर्जर बाहुपाश
कांपती अंगुलियां
बस धुंध ही धुंध है
कारवें के चिन्ह हैं
वो गांव अब उजड़ गया
स्वन था जो बिखर गया।

Monday, 7 January, 2008

मैं

टुकड़े-टुकड़े
स्याह बादलों सी तैरती
मेरी अंतर्व्यथा की अंधियारी
सिंदूरी सांध्य में फैलती
खामोश राहों की हरियाली
और निढाल सा
'मैं'
तपती गर्मी की रेत सी
बेमानी इच्छाएं
मेरी महत्वाकांक्षाएं
व्यतिक्रम है, बिखराव है
को तादात्म नहीं है
मौसम से मेरा
नई हरी कोपलों के बीच
पीत पड़े पत्ते सा
नितांत अकेला
'मैं'
इंतजार में
कब टूट कर गिरता
खुलकर नर्तन करता।

मां

आकंठ आशंका से भरी
दिन भर खोई-खोई
सहमी सी डरी
बात-बात पर झुंझलाती
सांझ ढले इतराती, इठलाती
खूब बतियाती
जब बेटी घर आ जाती।
आधी रात को
अचानक चौंक सी जाती
उठती, बटुए के पैसे गिनती
पायल और कंगन
सहेज कर सिरहाने रखती
अलसाई सोई बेटी का
मुंह निहार, माथा चूमती
बेटी के सपने भी खुद बुनती
घोड़े पर राजकुमार की तस्वीर
ज्यों आंखों में बनती
इत्मीनान की नींद
सो जाती है 'मां'
........... भोर होते
दहशतज़दा रहने के लिए।

Monday, 31 December, 2007

यादें

मां का अंक
वह किलकता बचपन
हमने खोया है
तितली के हों रंग-बिरंगे पंख
या फिर पंखुड़ियों सा हो
कोमल मन
हमने खोया है।
दादी के लोरी की थाती है
चांद सलोना
तुतलाती भाषा में
स्नेह सिखाती नन्हीं बहना
गिल्ली डंडा और लच्चीडानी में
दिनचर्या का ठप होना
माटी में धुरियाया हुआ
सुवासित तन
हमने खोया है।
सपनों में परियों का
खेलों में गुड्डे-गुड़ियों का
रचा-बसा हुआ संसार
बूढ़े बाबा की गीली आंखों में
भावी जीवन का सार
मेंहदी, बेला, रजनीगंधा
मेरे आंगन
हरसिंगार, चंपा और सोनजुही से
महका उपवन
हमने खोया है
था प्रश्नों का अंबार जहां
था गति का ही विस्तार जहां
रूठे तो बहलावे थे
रोने पर था दुलार जहां
स्मृतियों में वो पसरा बचपन
हमने खोया है

Sunday, 30 December, 2007

स्मृति शेष

मेरी स्मृति में
एक नदी है
उफनाई हुई सी
घड़ी का एक पेंडुलम है
दोलन करता हुआ सा
आज जब मैं
अपनी स्मृतियों को
वर्तमान से जोड़ता हूं
उफनाई हुई नदी की जगह
तुम्हारे रूप को पाता हूं
और पेंडुलम की तरह
दोलन करता हुआ मैं
इकाईयों में
विभाजित होता रहता हूं
अचंभित हूं
मेरा वर्तमान,
भूत के विस्तार में
इतना सीमित कैसे हो गया।

Friday, 28 December, 2007

अभी-अभी

स्याह पृष्ठ पर
नारंगी अक्षर,
गहन काली रात के बाद
ज्यों दिखी हो
भोर की किरण।
बस अभी-अभी....

Thursday, 27 December, 2007

दादू

एक दिन
जब मैं दादू के साथ सोया था
लिपटकर अचानक खूब रोया था
नहीं उभरी थी
वो सीघों वाली आकृतियां
न ही चमकी थीं
लाल डोरे वाली आंखे
ढुलकते टेसुओं के साथ
सपनों में उस रात,
दादू आए थे।
फिर कभी ऐसे न आना
दादू सपना मत बन जाना
सुबकते हुए कहा था मैने
मत दिखाना दादू, मत दिखाना
ऐसे सपने
महसूस किया था
हथेलियों का कंपन गालों पर अपने
बोले थे दादू, बहुत ही धीमे
मेरे अपने नन्हें
संजोए रखना इन्हें
बस संजोए रखना इन्हें।

ज़िंदगी (माघ मेला इलाहाबाद)

अलाव तापती है ज़िंदगी
कंबल में ठिठुर गई है,
धौंकनी सी हांफती है ज़िंदगी।
रेत पर सूखती अंगिया से,
बिंध गई है व्यभिचारी टकटकी।
दूध के लिए चीख-चिल्ला रही है ज़िंदगी,
विसर्जित अस्थियों को,
अश्रु पिला रही है ज़िंदगी।
माइक पर गूंजती आवाज़ में,
भूले-भटकों को
शिविर में बुला रही है ज़िंदगी,
"राम प्रकाश जी,
मेला क्षेत्र में जहां कहीं भी हैं
तुरंत घर चले आएं,
उनका लड़का खतम हो गया है"
........आस्था ठुकरा रही है ज़िंदगी।

ख़ामोशी

बहुत कुछ है भीतर
शब्द, परिभाषा, व्याख्या से इतर,
रुका हुआ सा।
क्या कहें
और आखिर तुम्हीं से क्यों,
हाथों में लिए हाथ
चुप कब-तक रहेंगे यूं,
जानता हूं शब्दों की जालसाजी,
जिसने जैसी चाही
मौन की भी परिभाषा दी,
एक विषंगति है
जैसे निजता हो अधूरी
छपटाहट ऐसी,
जैसे रचना न हुई हो पूरी।
अकुलाहट है उड़ने की,
फैलाते हुए पर
मापना चाहता हूं विस्तार नभ का
बाहें पसार कर।
बहुत कुछ है भीतर
शब्द, परिभाषा, व्याख्या से इतर
रुंधा हुआ सा।

Tuesday, 2 October, 2007

THis is my first post (सांझ-सवेरे)

hi to all